निदेशक संदेश [en]

dirnwभारत का पूर्वी क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है | हालाँकि इसकी क्षमता को कृषि उत्पादकता के विकास, गरीबी उन्मूलन एवं आजीविका में बढोतरी के लिए पूर्ण रूप से इस्तेमाल नहीं किया जा सका |

इस क्षेत्र में ३१.४ मिलियन हेक्टेयर शुद्ध बुआई क्षेत्र है | हालाँकि मुख्य कृषि-बागबानी फसलो एवं मात्स्यिकी की उत्पादकता यहाँ की उत्पादन क्षमता की तुलना में कम है |

इस क्षेत्र में लगभग ६९% सीमांत कृषक है | नवीनतम अथवा आधुनिक कृषि प्रधोगिकियों को कार्यान्वयन करने में छोटे एवं टुकड़ों में विभाजित जोत यहाँ की सबसे बड़ी बाधा है | इसके अलावा मृदा की अम्लता एवं क्षारीयता/लवणता, जिसकी चपेट में लगभग ११.३ मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र है, जो काफी हद तक मुख्य फसलों की उत्पादकता को प्रभावित करती है | सामान्यत: मृदा की अम्लता/लवणता, सबसे कम प्रति व्यक्ति आय, लगातार बढ़ती आबादी, प्रति वर्गमीटर अधिक जनसंख्या घनत्व, भंडारण, प्रसंस्करण, एवं विपणन की मूलभूत संरचनाओं की कमी भी पूर्वी क्षेत्र में कम कृषि विकास के लिए जिम्मेवार अन्य कारक हैं| पूर्वी क्षेत्र में विशेषकर असम के मैदानी क्षेत्रों, बिहार, छातीसगढ, ओडिशा एवं झारखण्ड में भू-जल का भी उपयोग बहुत कम होता है| भू-जल के उपयोग को बढावा देने के लिए उपयुक्त प्रौधोगिकियों के साथ-साथ अन्य पद्दतियो के संयोजन से यद्दपि कृषि प्रबलता (Cropping Intensity) में बृद्धि तथा उत्पादन में उल्लेखनीय बढोतरी होगी| इसके अतिरिक्त पूर्वी क्षेत्र में जल उत्पादकता भी काफी कम (०.२१ – ०.२९ कि.ग्रा./मी.३ ) है |

इस क्षेत्र में अच्छी नस्ल के पशु, चारा एवं भूसा तथा पर्याप्त पशुओं के स्वस्थ सुरक्षा व्यवस्था की भी अभाव है| पूर्वी क्षेत्र के काफी बड़े हिस्से में सुनिश्चित सिचाई का भी प्रावधान नहीं है| परिणामस्वरूप अल्प समय का सुखाड़ भी कृषि उत्पादन की स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है| एक अनुमान के मुताबिक, लगभग १० मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र सूखे से प्रभावित है| यह क्षेत्र विभिन प्रकार के जैवभौतिक समस्याओं से भी घिरा हुआ है जैसे खरीफ के मौसम में जल का अधिक जमाव या बाढ़ आना | पठारी क्षेत्रों में, कम उपजाऊ लाल-पीली लैटेरेटीक मृदा, ऊँची-नीची/असमतल स्थालाकृति तथा अधिक वर्षा के कारण जल का उपवाह, मृदा अपरदन एवं भू-क्षरण निरंतर होता रहता है|

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए की प्रौधोगिकी एकीकरण, मांग आधारित उत्पादकता को बढाने वाले अनुसन्धान कार्यावली तय करना जिसमें दोनों पारंपरिक तथा अग्रणी प्रौधोगिकियों का उपयोग किया जाए जो प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन तथा उत्पादन की स्थिरता बनाये रखने के लिए अनिवार्ज हैं क्योंकि पूर्वी क्षेत्र में कृषि कार्य काफी विविध प्रकार का तथा जोखिम भरा है
आज अनुसन्धान प्राथमिकताओं को एक बार फिर उपयोक्त तथ्यों के मद्देनजर अनुकूल बनाना होगा ताकि विशेषकर १२वीं योजना काल के दौरान खाद्य सुरक्षा के लक्ष्य को भी प्राप्त किया जा सके |

आज आवश्कता है कि पूर्वी क्षेत्र के लिए भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् के अनुसन्धान परिसर को वैज्ञानिक जनशक्ति एवं बुनियादी सुविधाओं के मामले में और मजबूत बनाया जाए ताकि इस भू-भाग के ४०७.१० मिलियन लोगों की अनुसन्धान एवं विकास संबंधी जरूरतों को पूरा किया जा सके | यह संसथान सचिव डेयर एवं भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् के महानिदेशक डा. एस. अयप्पन के सक्रिय नेतृत्व एवं प्रोत्साहन के लिए आभारी है | डा. ए. के. सिंह उपमहानिदेशक (एन.आर.एम), भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् को भी विशेष धन्यवाद है कि उन्होंने हमेशा हमारा मार्गदर्शन किया एवं अनुसन्धान तथा विस्तार गतिविधियों की भी निगरानी की | मैं इस संस्थान की अनुसन्धान एवं विकास गतिविधियों को मजबूत बनाने में अध्यक्ष आर.ए.सी. तथा अध्यक्ष क्यू.आर.टी. के प्रयासों की सराहना करता हूँ |

(डॉ. बी.पी. भट्ट)